सोमवार 30 मार्च 2026 - 15:57
रमज़ान युद्ध; कर्बला की घटना की एक झलक

जब यज़ीद सत्ता के तख्त पर बैठा तो उसने मदीना के गवर्नर वलीद को हुक्म दिया कि इमाम हुसैन (अ) से बैअत ली जाए। जब इमाम को यज़ीद का पैग़ाम मिला तो आपने वलीद से ख़िताब करते हुए पहले अपने फ़ज़ाइल व मनाक़िब बयान किए, फिर यज़ीद की अख़लाक़ी बुराइयों जैसे सरकशी, नाफ़रमानी, शराब नोशी, क़त्ल-ए-नाहक़ और माशरे में फसाद फैलाने की निशानदेही की और फरमाया: "मिस्ली ला युबायेउ मिस्लाह" यानी मेरे जैसा शख्स, यज़ीद जैसे शख्स की बैअत नहीं कर सकता।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, जब यज़ीद सत्ता के तख्त पर बैठा तो उसने मदीना के गवर्नर वलीद को हुक्म दिया कि इमाम हुसैन (अ) से बैअत ली जाए। जब इमाम को यज़ीद का पैग़ाम मिला तो आपने वलीद से ख़िताब करते हुए पहले अपने फ़ज़ाइल व मनाक़िब बयान किए, फिर यज़ीद की अख़लाक़ी बुराइयों जैसे सरकशी, नाफ़रमानी, शराब नोशी, क़त्ल-ए-नाहक़ और माशरे में फसाद फैलाने की निशानदेही की और फरमाया: "मिस्ली ला युबायेउ मिस्लाह" यानी मेरे जैसा शख्स, यज़ीद जैसे शख्स की बैअत नहीं कर सकता।

इमाम हुसैन (अ) ने इस अज़ीम ज़िल्लत को हरगिज़ क़बूल नहीं किया और उसी लम्हे से एक नाजायज़ हुकूमत के ख़िलाफ़ अवाम में बेदारी पैदा करने की जद्दोजहद शुरू कर दी। जब आपको ख़तरात का सामना हुआ तो मदीना छोड़ने का पुख्ता इरादा कर लिया।

इमाम (अ) ने अपनी तहरीक के आग़ाज़ से लेकर इख्तिताम तक एहतिजाज, हक़गोई और बेदारी को अहमियत दी, मगर आपके तमाम मवाकिफ़ इंतहाई मंतिक़ी, पुरअमन, ख़ैरख़्वाहाना और हर क़िस्म की शिद्दतपसंदी से पाक थे। आप इस बात का ख़ास ख़याल रखते थे कि हुकूमत के करिंदों की तरफ से कोई खूनरेज़ी न हो। जब मालूम हुआ कि मक्का में आपके क़त्ल की साज़िश हो रही है तो फ़ौरन मक्का से निकलने का फ़ैसला किया।

वाक़ेए-कर्बला अपनी अस्ल में हमासी और जेहादी होने के बावजूद हरगिज़ जंग भड़काने या खूनरेज़ी की तहरीक नहीं थी। इमाम (अ) ने मदीना से निकलने के बाद से आशूरा तक हमेशा सब्र, वक़ार, अमन, बक़ाय-ए-बाहमी, मुकालमा और मुफ़ाहमत पर ज़ोर दिया। यहाँ तक कि बाज़ मवाक़िफ़ पर असहाब ने हुर के लश्कर पर हमला करने की तजवीज़ दी, जो इंतहाई कमज़ोर हालत में था, मगर इमाम (अ) ने इनकार करते हुए फरमाया: "मैं हरगिज़ जंग का आग़ाज़ नहीं करूँगा"।

इसी तरह आपके नुमाइंदे मुस्लिम बिन अकील को भी हानी बिन उरवा के घर में यह मशविरा दिया गया कि वह उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद को धोखे से क़त्ल कर दें, मगर उन्होंने कहा: रसूलुल्लाह (स) ने ख़ुफ़िया क़त्ल (दहशतगर्दी) की इजाज़त नहीं दी, इसलिए उन्होंने ऐसा नहीं किया।

तहरीक-ए-हुसैनी में कहीं भी जारहियत या जंगपसंदी की मिसाल नहीं मिलती। यहाँ तक कि रोज़-ए-आशूरा भी बनी हाशिम के जवानों और असहाब की लड़ाइयाँ दिफ़ाई नौ'अ की थीं; वह सिर्फ अहल-ए-बैत (अ) का दिफ़ा कर रहे थे। क़त्ल व ग़ारत और ज़ुल्म व सितम यज़ीदियों की तरफ से हुआ।

आज जंग-ए-रमज़ान में भी यही हक़ीकत दिन की रौशनी की तरह वाज़ेह है। शायद इसी हक़ीकत की तरफ इशारा था कि इंकलाब के शहीद रहनुमा ने अपनी शहादत से चंद रोज़ पहले इमाम हुसैन (अ) के इसी जुमले "मिस्ली ला युबायेउ मिस्लाह" पर ज़ोर दिया।

इस्लामी जमहूरी-ए-ईरान ने अमरीका के साथ बराह-ए-रास्त और बालवास्ता कई मराहिल में मुज़ाकिरात किए और बाज़ मवाक़िफ़ पर रियायतें देकर अपनी नेक नीयती दुनिया पर वाज़ेह की। यहाँ तक कि जौहरी मुआहिदे के मौके पर "नरमिश-ए-क़हरमाना" के उसूल के तहत इसका ख़ैरमुक़दम भी किया गया, मगर दुनिया ने देखा कि ट्रंप ने यकतरफ़ा तौर पर मुआहिदा तोड़ दिया। हालिया दिनों में भी मुज़ाकिरात के दौरान, नेतन्याहू के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया गया, जिस में फौजी व सियासी शख़्सियतें, आम शहरी, बच्चे और यहाँ तक कि रहबर-ए-इंकलाब भी शहीद हुए। इससे वाज़ेह हो गया कि उनके नज़दीक मुज़ाकिरात महज़ धोखा है और अस्ल मक़सद ईरान को कमज़ोर और तक़सीम करना है।

चंद अहम नुक्ते:

आज जो जुर्रतमंदाना फ़ैसला अस्करी व सियासी क़यादत ने दुश्मन के ख़िलाफ़ किया है, वह हरगिज़ जंग छेड़ना नहीं बल्कि एक मुकम्मल शरई, क़ानूनी, अक़्ली और अख़लाक़ी दिफ़ा है, जिस की हिमायत सब पर लाज़िम है।

इस हसास मरहले में क़यादत के दरमियान मुकम्मल हमआहंगी मौजूद है और सब का मक़सद दुश्मन को जवाब देना है। हमें चाहिए कि ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयानात, इख़्तिलाफ़ात या तक़सीम पैदा करने से परहेज़ करें, क्योंकि यह दुश्मन के मुफ़ाद में होगा। मैदान और सफ़ारत-कारी दोनों साथ-साथ क़ौमी ताक़त की अलामत हैं।

जंगी हालात में ज़रूरी है कि सब लोग क़यादत और ज़िम्मेदार इदारों की हिदायात पर अमल करें। अगर हर शख्स अपनी राय पेश करने लगे तो निज़ाम में खलल और इंतिशार पैदा होगा। उन लोगों पर एतिमाद करना जो मैदान में मौजूद हैं, बेहतरीन खिदमत है।

ईरान की अवाम, जो इन दिनों मुख़्तलिफ़ इज्तिमाआत में भरपूर शिरकत कर रही है, उनकी सबसे बड़ी ख़्वाहिश इत्तेहाद, यकजहती और दुश्मनों को इबरतनाक सज़ा देना है, ताकि वह दोबारा इस ख़ित्ते में मुदाख़लत न कर सकें। हम दुआगो हैं कि वह इस मक़सद में कामयाब और सरख़रू हों।

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